राजस्थान का इतिहास

राजोगढ़ के गुर्जर - प्रतिहार - राजोगढ़ ( अलवर ) के शिलालेख ( 960 ई . ) से ज्ञात होता है कि से तत्कालीन समय में रायपुर ( राजोगढ़ ) पर प्रतिहार गौत्र के गुर्जर सावट के पुत्र मंथन देव का राज्य था । जो महिपाल के बड़े सामन्तों में से एक था ।  उस समय यहाँ भी गुर्जर जाति के किसान भी रहते थे । इनमें ढूँढाड व माचेड़ी के गुर्जर बडगूजर कहलाते थे । बहलोल लोदी के आक्रमण के समय राजोगढ़ में बडगूजरों का रहना प्रमाणित होता है ।






बर्रातमान समय में ये राजपूत मूल रुप से दौसा और अलवर में रहते है । आज भी ईस कुल के राजपूत राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में विस्तृत है. ।

कुल देवी - आशावरी माता 



अन्य जानकारी 

दौसा का दुर्ग राजस्थान के दौसा नगर में ‘देवागिरि’ नामक पहाड़ी पर स्थित है। यह कछवाहा राजवंश की पहली राजधानी थी। प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता कार्लाइल ने इसे राजपूताना के क़िलों में रखा। इसकी आकृति ‘सूप’ के समान है।

  • इस दुर्ग का निर्माण : बड़गूजरोंगुर्जर-प्रतिहारों ) द्वारा करवाया गया था। बाद में कछवाहा शासकों ने इसका निर्माण करवाया।
  • यह विशाल मैदान से घिरा हुआ गिरिदुर्ग है। इसमें प्रवेश के दो दरवाज़े हैं-
  1. हाथीपोल
  2. मोरी दरवाज़ा


  • मोरी दरवाज़ा छोटा तथा संकरा है, जो सागर नामक जलाशय में खुलता है।
  • क़िले के सामने वाला भाग दोहरे परकोटे से परिवेष्टित है। इसमें मोरी दरवाज़े के पास ‘राजाजी का कुँआ’ स्थित है। इसके पास में ही चार मंजिल की विशाल बावड़ी स्थित है।
  • बावड़ी के निकट बैजनाथ महादे' का मंदिर अवस्थित है।
  • क़िले के अंदर भीतर वाले परकोटे के प्रांगण में ‘रामचंद्रजी’, ‘दुर्गामाता’, ‘जैन मंदिर’ तथा एक मस्जिद स्थित है।
  • दौसा दुर्ग की ऊँची चोटी पर गढ़ी में नीलकण्ठ महादेव का मंदिर है। गढ़ी के सामने 13.6 फीट लम्बी तोप स्थित है।
  • गढ़ी के भीतर अश्वशाला ‘चौदह राजाओं की साल’, प्राचीन कुण्ड तथा सैनिकों के विश्रामगृह स्थित हैं।
  • राजा भारमल के शासन काल में आमेर के दिवंगत राणा पूरणमल के विद्रोही पुत्र ‘सूजा’ (सूजामल) की हत्या लाला नरुका ने दौसा में की थी, जिसका स्मारक क़िले में मोरी दरवाज़े के बाहर सूर्य मंदिर के पार्श्व में स्थित है । यह जनमानस में 'सूरज प्रेतेश्वर भौमिया जी' के नाम से प्रसिद्ध है।

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